गैरमहफूज़

न नींद आई न ख़्वाब आया
उबलता इक डर बेताब आया

सब पके शेर मिट गए ज़हन से
अधपके नज़्मों का किताब आया

टूटे मिसरों और छूटे नुक़्तों संग
झूठे शायर का ख़िताब आया

ख़ौफ़-ए-ज़लालत तो पहले से थी
नकली बेख़ौफ़ि का नकाब आया

वज़न-ए-थकावट से पलके गिरें
तभी दस्तक-ए-आफ़ताब आया

इन आँखों की लाल लकीरों में
फिर छूटे नींद का हिसाब आया

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