यादों में सूरत तुम्हारी देख के दिन गुज़ारी है
दिल में लेकिन ज़ोरों से रस्म-ए-इश्क़ जारी है
ये दूरी की दिवार ऊंची, छाओं में उसके बैठ कर
आशाओं की रौशनी अब नग्मों में उतारी है
डरो मत इन बादलों से, दर्द जो बरसातें हैं
अपने अश्कों की नमी से ही तो ये भी भारी हैं
राह मुश्किल जितनी भी हो, साथ चलना है हमें
काटों पे पैरों के कटने की पूरी तय्यारी है
हाथ छोड़ें चोट खाकर, हम तो वो शायर नहीं
हर चोट से मिसरा बहा दें वो कला हमारी है
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