October 31, 2020

How often does Halloween
Come on a full moon night?
And workless werewolves,
Fired or furloughed,
Tired of fur loads,
Save the silvers
In their costume budget?

Once in a blue moon, I suppose.

Break

You know you need a break when
Looking at lush, black,
Sunlight-glowing
Grapes upon grapes
Of natural abundance
In an autumnal-smelling vineyard,
All you can notice is
How in a month’s time
There’d be rotten fruit
On some factory floor
That would translate to
A black bottomline on a spreadsheet.

Cog

In a hot pot sitting atop a flame
I’m so like a lazing frog,
Clickin’ my tongue to crop a claim
“I’m such an amazing cog!”

In a machine that’s rotten
Its oiling forgotten
And cogs losing teeth all day.
Now wheels don’t move
In the lock-step groove
That had made me say “Olé!”

There’s many a job to pay the bills
And pack this plight away.
Yet not a one to stay the chills
That wrack me night and day.

Joker

I know you had a bad day, buddy
Though not so bad as mine
But I won’t rattle the BS script
That everythin’ will be fine

You know as well as I do now
That this too shall not pass
It’ll stick around, and gut you too
This life’s li’l Masterclass

So, as you raise your head today
Put on your hotter smile
For sure you need some warmin’ up
Your cold blood’s so reptile

Go out that door and paint it all
This whole town in your hue
And stop not in your enterprise
Till no one’s laughin’ at you

Till no one’s laughin’ at you
Till no one’s laughin’ at you

हमशिकवा

तुम कलकत्ता के नाती हो
हम बरहमपुर के पोते हैं
पर रिश्ते में एक दूजे के हम
हमशिकवा ही होते हैं

सोचा था नज़्में घोलेंगे
लोगों की आँखें खोलेंगे
शिकवों की तलवारों से
दुनिया पे धाबा बोलेंगे
क्यों लिखने के टाइम पे फ़िर
हम चादर ओढ़ के सोते हैं
तुम कलकत्ता के नाती हो
हम बरहमपुर के पोते हैं

कभी बिरियानी की स्वाद में
या अंग्रेज़ी अनुवाद में
फस जाने का बहाना कर
हम कह देते हैं “बाद में”
यूँ फुरसत की किनारों पे
क्यों गंगा में हाथ धोते हैं
तुम कलकत्ता के नाती हो
हम बरहमपुर के पोते हैं

अब वक़्त है कागज़ फाड़ने का
कुछ शेर नया दहाड़ने का
“मसरूफ़” नाम के तिनके को
दाढ़ी से अपने झाड़ने का
ए वारिस रस्म-ए-नज़्मों की
चल नया मिसरा फिरोते हैं
तुम कलकत्ता के नाती हो
हम बरहमपुर के पोते हैं

मिन्नु का टॉफ़ी

मिन्नु का टॉफ़ी मिन्नु सा नहीं था ।
जहां जहां मिन्नु बल्लून सा फूला था,
वहां वहां टॉफ़ी डोर सा पतला था।
जहां मिन्नु का ग़ुरूर उसे हवा में उडाता था
वहां टॉफ़ी का डोर उसे ज़मीन पे ले आता था।

मिन्नु से पूछता था, “ऊपर पहुँचके करोगे क्या?
बादलों में तुम्हारी कोई अहमियत तोह है नहीं।
अंदर महसूस होते peer pressure से फ़ट जाओगे।
यहीं रुको, किसी के चेहरे पे smile तोह ले आओगे।”

वैसे उड़ने का शोक टॉफ़ी को भी था,
पर कटे पतंग के अनाथ मांझे सा नहीं।
बेहेन की राखी से छूटे भाई की हँसी पर उड़ना था उसे।
किसी पेड़ पे बंधी दुआओं पर उड़ना था उसे।
कहता था
“उड़ना ही है तोह ख़ुशी फैला के उड़ो।
चरखे की सूती सा धुल चला के उड़ो।
खुद में गरम हवा भरने का क्या मोल है?
बाती के धुएं पे रौशनी जला के उड़ो।”

दो साल होगये हैं अब तोह।
खींचा तानी का खेल अभी भी चालु है।
मिन्नु अब भी घर बादलों में ढूंढ रहा है
और टॉफ़ी किसी दरगाह पे बिछी चद्दर में।

ए मालिक तेरा बंदा हूँ नहीं मैं

ए मालिक तेरा बंदा हूँ नहीं मैं
पर तेरे कुछ पल और मांगने आया हूँ
जिसे तू ने बनाया मुझे बनाने के लिए
उसके कुछ कल और मांगने आया हूँ

आदत थी उन्हें एक ही चप्पल की
टूटती नहीं तो नया नहीं लेते थे
स्कूल के जूतों संग रात को मुझे
चप्पल भी पॉलिश करने कहते थे
तब ज़ुल्म और आज नसीब मानकर
एक दो चप्पल और मांगने आया हूँ
जिसे तू ने बनाया मुझे बनाने के लिए
उसके कुछ कल और मांगने आया हूँ

न्यूज़ के बाद रेडियो पर रोज़
नुसरत संग सुर लगाते थे
मैं शिकायत करता तो मुझे
हस के रुई ढूंढने भगाते थे
तब ज़ुल्म और आज नसीब मानकर
बेसुरे वो ग़ज़ल और मांगने आया हूँ
जिसे तू ने बनाया मुझे बनाने के लिए
उसके कुछ कल और मांगने आया हूँ

ए मालिक तेरा बंदा हूँ नहीं मैं
पर तेरे कुछ पल और मांगने आया हूँ

अपना कर ले

अपने टाइम की तलाश छोड़
हर लम्हें को तू अपना कर ले
रातों की नींद छोड़
सच्चाई ये सपना कर ले
जलाके प्यास भूख
राख को ही चखना कर ले
भुलाके आदि तू
अनंत को ही अपना कर ले

अपना कर ले
अपना कर ले
अपना कर ले
अपना कर ले

खूं में ही है शायरी तो
स्याह तेरी भूरी क्यों है
नाम में है मिसरा तो
नज़्म ये अधूरी क्यों है
आवाज़ दिल से है तो
लब से दिल की दूरी क्यों है
जीना है खाबों मे
हक़ीक़त से मंज़ूरी क्यों है

बोल

हैं हौसले मुरादों में
इरादों को तू अपना कर ले
जलाके भूख प्यास
राख को तू चखना कर ले
भुलाके आदि तू
अनंत को ही सपना कर ले
छुडाके वक़्त से
हर लम्हें को तू अपना कर ले

अपना कर ले
अपना कर ले
अपना कर ले
अपना कर ले

ट्रैफिक में तू क़ैद है
चल अपनी गाड़ी मोड़ ले
उस रियरव्यू के शीशे को
खुद अपने हाथों तोड़ ले
छत को दे गिरा
खुद को धूप से तू जोड़ ले
आगे गिरती बारिशों को
शर्ट से निचोड़ ले

चल

इस हाईवे से दूर
टूटे रास्ते को तू अपना कर ले
ढाबों के नान छोड़
खाख को ही चखना कर ले
भुलाके आदि तू
अनंत को ही सपना कर ले
छुडाके वक़्त से
हर लम्हें को तू अपना कर ले

अपना कर ले
अपना कर ले
अपना कर ले
अपना कर ले

सुलह

बिना सुलह किये हम सोते नहीं
ग़म में रात रात भर रोते नहीं
हर सुबह नयी शुरुवात होती है
झगड़ों में एक दूजे को खोते नहीं

मेरे खयाल-ए-ख़ुदकुशी

कदम कदम पे साया सा
क्यों आता मेरी ओर है यूँ
गले गले के दरमियां
क्यों बांधा कोई डोर है यूँ

तू रहता क्यों फ़िराक़ में कि
ज़मीं ही मेरी खींचेगा
ज़्यादा ग़म हो सीने में तो
ज़मीं लहु से सींचेगा

ले मान लिया तेरी बात को
कि पूरा ही बेकार हूँ मैं
पर इस वहम में न रहियो
कि तेरा ही शिकार हूँ मैं

तू चल ले चालें जितनीं भी
दे मात मुझे न पाएगा
शह शह के चक्कर में
खुद व्यूह में फस जाएगा

बहुत हुआ नादानी ये
कब तक इसे हम झेलेंगे
कब तक हम एक दूजे के संग
लुक्का छुप्पी खेलेंगे

वुजूद तेरा मुझ बिन नहीं
समझ इतना तो पाया हूँ
उतारने तेरे मौत की लत मैं
परोस के जीना लाया हूँ

साथ में मरना तय ही है जब
थोड़ा साथ में जी भी ले
आंसू तूने खूब पिलाये
अब रूह अफज़ा भी पी ही ले