गुम हैं

क़ुदरत के हर इशारे में जितने नज़ारे गुम हैं
हर नज़ारे में क़ुदरत के उतने इशारे गुम हैं

कहते हैं ये झरना हर साल नया रास्ता काटता है
इसके धार में न जाने कितने किनारे गुम हैं

महसूस होता है जब जलता है चट्टानों पे बदन
कि सूरज की हर किरण में कितने अंगारे गुम हैं

हर पत्थर के हर ठोकर से दोबारा चलना सीखा
अच्छा है कहीं शहर के सारे सहारे गुम हैं

मन करता है यहीं बैठे गिनता रहूँ ‘मिसरा’
शहरी फ़लक़-ए-ज़ार के तमाम सितारे गुम हैं

ज़्यादा है

माना वस्ल की राहत में राहत ज़्यादा है
अनार भी स्वाद है पर मेहनत ज़्यादा है

होंगे और भी दुःख मोहब्बत के सिवा
वही ढूँढ लें जिन्हें फुरसत ज़्यादा है

होगा इश्क़ भी हिमालय के पानी सा पाक
पहले मुफ़्त मिलता था अब कीमत ज़्यादा है

ज़िन्दगी भी बस एक उम्र-क़ैद की सज़ा है
जीने की ख्वाहिश कम है मोहलत ज़्यादा है

तक़दीर भी क्या क्या मज़े लेता है मुझसे
ये उसकी शरारत कम फितरत ज़्यादा है

तुझसे खूब शिक़वे हैं पर ये नहीं ‘मिसरा’
कि तेरे मिसरों में हक़ीक़त ज़्यादा है

जलाए

मैं बैठा हूँ अपना बसेरा जलाए
इस ठंडी रोशनी में अंधेरा जलाए

बुझा आया हूँ जिसके लिए थे फेरे
आज उसी आग में कस्म-ए-फेरा जलाए

किसको रहनुमा मानके चलूँ यहां
खड़ा है मशाल हर लूटेरा जलाए

कोई मारुति था जो बंधा था यहां
निकल गया पुलिस का घेरा जलाए

हाँ होगी दिवाली पूरे देश में ‘मिसरा’
ख़बरदार कोई दिया मेरा जलाए

तय्यार नहीं

ज़िन्दगी मुझसे रूठने को तय्यार नहीं
और ये दिल है कि टूटने को तय्यार नहीं

सुना था शायरी में किस्मत फूटती है
मेरी किस्मत है कि फूटने को तय्यार नहीं

राशन के बहाने किताबें बेच आया
पर अदब है कि छूटने को तय्यार नहीं

ज़र-ओ-ज़ेवर लिए सर-ए-दार हो गया
पर कोई मुझे लूटने को तय्यार नहीं

तय्यार खड़ा हूँ मांगते खाहिशें ‘मिसरा’
सितारा है कि टूटने को तय्यार नहीं

खालीपन

क्यों उम्मीद करूं कि दिल में कोई प्यार भरे
जब इंतिकाम के ऐलान से दिल दीवार भरे

उसका भी दिल टूटा जब मेरा तोड़ा था उसने
फिर क्यों दिल चाहे कि वो क़ीमत बार बार भरे

प्यार के पर दिए पर किसीने सिखाया नहीं
इन तूफानों में कैसे कोई रफ़्तार भरे

मेरी तो किस्मत ही है कि वो घड़ी बनूं जो
फिसलती रेत-ए-वक़्त से अपना इंतेज़ार भरे

क्यों उस सिल्विया सा बनने चला हूँ ‘मिसरा’
जिसने फ़ुज़ूल ही मायूसी के बेल्ल-जार भरे

मांगता है

कभी खून तो कभी ये पेसाब मांगता है
ये डॉक्टर तो पूरा ही हिसाब मांगता है

एक भी पन्ने की पढ़ाई नहीं हूँ मैं
पर मांगता है तो पूरी किताब मांगता है

लौटाएगा तो बस दो ही आँख की रोशनी
मगर बदले में पूरा आफ़ताब मांगता है

दो-चार बोतल गुलकोज़ क्या चढ़ा दिए
दाम में गंगा क्या झेलम चेनाब मांगता है

क्यों हर इंसान मेरे जैसा नहीं ‘मिसरा’
जो दवा के बदले बस शराब मांगता है

गुज़ारिश नहीं की

मयनोशी की गुज़ारिश नहीं की
मदहोशी की गुज़ारिश नहीं की

रात को हंगामा ओढ़े सो गया
ख़ामोशी की गुज़ारिश नहीं की

सुबह तक दिल खुश था कि खूँ ने
गर्मजोशी की गुज़ारिश नहीं की

होश में था जब जर्राह ने दिल सीया
बेहोशी की गुज़ारिश नहीं की

शुक्र है बदनामी से बचने मैंने
रूपोशी की गुज़ारिश नहीं की

इस राज़ को शिक़वा है ‘मिसरा’ ने
सरगोशी की गुज़ारिश नहीं की

क्या मैं हूँ

कहीं शेर-ओ-ख़याल के दरमियान मैं हूँ
या जो ये लिख रहा है वो इंसान मैं हूँ

कईं आवाज़ें गूंज रहीं हैं ज़हन में
क्या उन सभी आवाज़ों की पहचान मैं हूँ

डॉक्टर कहती है छे शख़सियत हैं मुझमें
हैं गर तो क्यों जान कर हैरान मैं हूँ

एक अलग सी महफ़िल जम गयी है मन में
माज़ी कईं हैं बस एक मेहमान मैं हूँ

हर आवाज़ को अलग शेर लिखना है यहां
शायद जो इन सबसे है परेशान मैं हूँ

सुना है इंसानों में ये नहीं है आम
क्या आदमखाल में फसा शैतान मैं हूँ

इस मक़्ते में तेरा तख़ल्लुस है ‘मिसरा’
उस तख़ल्लुस के पीछे का अनजान मैं हूँ

बेकार है

हसा भी दो हसाना बेकार है
यूँ मेरा मन बहलाना बेकार है

काफ़ी कम नमक की आदत है मुझे
समंदर घूमा ले जाना बेकार है

खिड़की मत खोलो फ़र्श ठंडा ही ठीक है
यूँ धूप की कालीन बिछाना बेकार है

काबूस बन चुके हैं ये सारे सपने
एक नया सपना दिखाना बेकार है

बेहतर है शाईरी में मशरूफ़ रहूँ
शाईरी से मशहूर होना बेकार है

ज़र-ए-गुल से एलर्जी है ‘मिसरा’
तुम्हारा गुलज़ार हो जाना बेकार है

ये दूरी की दिवार ऊंची

यादों में सूरत तुम्हारी देख के दिन गुज़ारी है
दिल में लेकिन ज़ोरों से रस्म-ए-इश्क़ जारी है

ये दूरी की दिवार ऊंची, छाओं में उसके बैठ कर
आशाओं की रौशनी अब नग्मों में उतारी है

डरो मत इन बादलों से, दर्द जो बरसातें हैं
अपने अश्कों की नमी से ही तो ये भी भारी हैं

राह मुश्किल जितनी भी हो, साथ चलना है हमें
काटों पे पैरों के कटने की पूरी तय्यारी है

हाथ छोड़ें चोट खाकर, हम तो वो शायर नहीं
हर चोट से मिसरा बहा दें वो कला हमारी है