जिहाद-ए-असग़र जीत के दुनिया हासिल किया
पर अंदर नफ़्स से हार गए तो क्या हासिल किया
डूबे ही रहे अपने ज़रूरतों में गर तुम
तुमने बस अपना नफ़्स-अल-अम्मारा’ हासिल किया
ज़माने को बक्श कर की ख़ुद से सवालात जिसने
उसी ने अपना नफ़्स-अल-लुव्वामा’ हासिल किया
न गुरूर हो न नाज़ हो अपनी नैकि पे जिसे
समझो उसीने नफ़्स-अल-मुल्लामा’ हासिल किया
दिल में सख़ावत रख के जिसने की तस्लीम-ए-जान
उसी ने तो नफ़्स-अल-मुतमा’इना’ हासिल किया
जो न कल में न कल में बस अभी में जीता हो
जान लो उसने नफ़्स-अल-रदिय्या’ हासिल किया
जो खुद चराग़ बनके ख़ुदा की रोशनी फैलाये
देखो उसीने नफ़्स-अल-मर्दिय्या’ हासिल किया
दुनिया का हो के भी होगा इंसान-ए-क़ामिल
अगर किसीने नफ़्स-अल-सफ़िय्या’ हासिल किया