मेज़ पे बैठा कवी, लिखने चला वो इक ग़ज़ल
मन से चुन कर द्वेष सारी रख दी उसने इक बगल
फिर भी ज़ुर्रत क्या हुई, कागज़ जो उससे रुठ गया
छोड़ उसको मेज़ पर, कागज़ वहाँ से उठ गया
Category: Hindi
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मेज़
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कागज़ के गेंदाफूल
कटे मिसरों के घाव लिए
बिखरे कागज़ के गेंदाफूल
याद करते हैं उन लम्हों को
जब क़लम का छूना भाता थालावारिस हलके झोकों में
एक दूजे की दूरी को भेद
बात करते हैं उन सपनों की
जहाँ खुलके उड़ना आता था -
पुनः मिलन
मैं जाना था तुम ज्ञानी हो ।
अब लगता है अभिमानी हो ।
भुलाके सारे यौवन वर्ष
स्मरण है केवल एक दिवस?
जब तर्क तर्क में फर्क उठा,
टेके फणा एक सर्प उठा,
विषैले शब्द और क्रोध कठोर
थे कोटी कोटी क्षत दोनों ओर ।
थे छल छल दोनों के नयन
पर छूने का न किया चयन ।
कटके उस दिन दो राह चले
करके काजल को स्याह चले ।माना उस दिन हम बच्चे थे ।
नादान, हृदय के कच्चे थे ।
पर अब तो पक के गल चुके
देख हज़ार हलचल चुके ।
कब तक जलें अभिमान में ?
आ मिलें सुलह संधान में ।
क्या मेरे कम हैं नखरें सब
कि जोड़ोगे उसमें तुम अब ?
गर द्वेष अभी भी है प्रखर
लो झुकता हूं नत के मैं सर ।
बस जल्दी से इंसाफ़ करो –
या दे दो दंड या माफ़ करो । -
क्लोज़र
आज काफ़ी दिनों बाद
कुछ यादों के सफ़्हे पलटने लगा हूँ।
चिपकने लगीं हैं कागज़ एक दूसरे से।
एक दूसरे की गर्माहट को चादर बनाए ओढ़ रहीं हैं।
उनको अलग करने का ज़ायका अभी भी जुबां पर लगा है।
कुछ कुछ तुमबिन तन्हाई सा स्वाद है।वो सारे अलफ़ाज़ जो तुम्हारे लिए बुने थे
क्रिसमस की स्वेटर जैसे भुला दिए गायें हैं।
रात रात भर जब तकिया बनाएं सो जाता था उनपे
उन रातों की लार अभी भी सूखे दाग से पड़ें हैं।बस कुछ बदला है तो ये है कि
अब इस डायरी में लिखना छोड़ दिया है।
अब किसी और के आँगन में यादें पीसता हूँ। -
विरासत
पच्चीस का होने वाला हूँ।
बालों में अब चांदी आने लगी है।
लोग कहते हैं पानी खराब होगा।
या पढाई का बोझ कुछ ज़्यादा ढो लिया होगा।कौन देख रहा है कैसे रोज़ रात
थोड़ी धड़कती उम्र स्याही में घोल कर
मिसरों में पोत रहा हूँ?एक रोज़ जब सूखे उपलों सा जिस्म
वक़्त के चूल्हे पे राख बन जायेगा।
यही चाँद अलफ़ाज़ रह जाएँगी इधर।
मेरे छोटी सी ज़िन्दगी का स्वाद दे जाएँगी सबको।आखिर चमचम पे थोड़ी चांदी तो बनती है।
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ठीक हो?
ठीक भी हूं, ठाक भी हूं
कहीं अचल अबाक भी हूंकहीं अंदर अमृत झरती है
उसके झर से पाक भी हूंपतझड़ ने पत्ते छीने हैं
अड़ा सक्त मैं शाख भी हूंतपना बुझना जिंदगी है
ज्वाला मैं हूं राख भी हूं -
क्या करते हो?
राह चलते किसीसे मिलता हूँ
तो सवाल आता है –
“क्या करते हो?”सच्चाई बयान करता हूँ तो
पागल समझते हैं मुझे।
कुछ तोड़-मरोड़ कर काट-जोड़ कर
कहानी बना लेता हूँ तो
उनके पिचके हुए फेफड़ों में
कुछ सांस वापिस आ जाती है।अब तो कोशिश करना छोड़ दिया है।
बोल देता हूँ – “शायर हूँ।”
तसल्ली से फिर वो तरस खाते हैं।कहते हैं फुसफुसा कर आपस में
“काफ़ी potential था इसमें।
न जाने कौनसे कमज़ोर मौके पे फिसल गया।”ये टिप्पणी भी बटोर लेता हूँ जेब में –
लम्हों का जमाकार जो हूँ।इक café के table पे बैठा
आते जाते हर लम्हे को पास बुला लेता हूँ –
“आओ। आज कैसे हो?”पता नहीं कौनसी जिज्ञांसा
उन्हें भी खींच लाती है मेरी ओर।
अपने राह से छोटा detour लेके
पास बैठ जाते हैं।
कह जातें हैं अपनी कहानियाँ।
मेरी दस्तानों की diary में
एक पन्ना बन जाते हैं।कोई पूछता है जब –
“कितना बना लेते हो, जनाब?”
बेजिझक कह देता हूँ तभी तभी
कि हर महीने कुछ तीस दिन
जमा हो जाते हैं salary में।
उन तीस दिनों के ब्याज पे
ज़िन्दगी गुज़रती है मेरी।रोज़ कुछ लम्हें दूसरों में भी बाँट देता हूँ।
आखिर charity भी तो घर से ही शुरू होती है। -
ट्रैन की खिड़की
ट्रैन की खिड़की से बाहर झांकता हूँ
तो शीशे पे ख़ुद ही का चेहरा दिख जाता है।
आँखों में जो तलाश पनप रही है
वही तलाश को रूबरू पा कर समझ नहीं आ रहा
कि अब एहसाँसों के मायेने ढूंढना छोड़ दूँ क्या?नींद का बोझ मुश्किल से संभाल रहा हूँ।
खुदसे नज़र मिलाने के लिए भी तो
पलकों का भर उठाना पड़ता है।
कुछ अस्कों का सैलाब बहने लगा है।
उस से बुझी सपनों की रौशनी को फिर से जलाना पड़ेगा।
जो नज़्म ख़ुशी के हसियों में नहीं खिलखिलाये
शायद ग़म के खामोश साँसों में निकल जाएँगी वो।
इसी बहाने शायद थोड़ा लिहने का बुखार उतर जाएगा। -
For old time’s sake
किस रिश्ते से आये हो?
जिस रोज़ से मेरी धड़कनें सुनने तुम्हें
Stethoscope चलना पड़ा,
उस रोज़ से तुम्हारी डॉक्टरी पे से
भरोसा उठ गया था मुझे।
गले का साँप लगता है वह चीज़-
हर बार जब छाती छूंता है,
कुछ ज़हरीला छोड़ जाता है तुम्हारे कानों में।
मेरे दिल की डुग-डुग को
न जाने कौनसा डंका बना देता है
कि जितना पास बुलाता हूँ,
तुम उतनी ही दूर चले जाते हो।क्यों छूं रहे हो माथे को? जाओ!
नहीं करना “आ”!
इस शीशे में पारे को क़ैद कर
नाप तो लोगे मेरे बदन की गर्मी,
पर उस शीशे का क्या करोगे
जिसमे तुम्हारा चेहरा देख रोज़ जलता हूँ?Dramatic बन रहा हूँ?
नहीं नहीं जी- शायर हूँ बस।
चार दिन के भूखे को देख
cyproheptadine नहीं लिख देता।
बैठता हूँ उसके साथ।
क्या ग़म सता रही है पूछता हूँ।
अब तक तो पता लग जाना चाहिए था।
कोई बिमारी नहीं है
जो बदन को क़ाबू किये बैठी है।
कुछ है तो ये है कि अंदर के इंसान पे अभी
सफ़ेद कोट का कफ़न नहीं चढ़ाया।
Potential की बात मत करो, price high था।जता रहे हो जी?
“For old time’s sake”?
क्या याद किये आये हो?
कहीं उन लम्हों को तो नहीं
जो यादों के पेड़ पर अब पक चुके हैं।
बचपने में ही तोड़ लाते तो सही रेहता।
थोडा कच्चा स्वाद ज़रूर आता ज़बान पे,
पर नमक मिर्च लगाते हाथ नहीं झिझकते।
आज वह पके फ़ल न तो तोड़े जाते हैं
न उन्हें ऐसे ही सड़ते देखा जाता है।
डर लगता है उन्हें छीलने में –
न जाने कौनसी खाँसी जकड लेगी।
तुम्हारे दवाओं की कड़वाहट बैठ गयी है –
अब मीठी सच्चाई भी तो नहीं उतरती गले से। -
डब्बे
पूरी रात डब्बे ढो रहा हूँ।
जाने का वक़्त आया तो समझ नहीं आ रहा था
क्या लूँ और क्या छोड़ जाऊं।
चार सालों का बोझ महसूस हो रहा था दिल पर।
कपडे तक कफ़न लग रहे थे।
सारे पुराने कपडे एक डब्बे में भर दिए फिर –
काफी गरीब भिकारी मंदिर के बाहर बैठते हैं।
रात को जब सारे सो रहे थे, डब्बा छोड़ आया वहाँ।एक सूट लिया था किसी ज़माने –
दर्ज़ी से ख़ास सिलवाया था हर कोने का नाप देकर।
नया नया सा था तो बदन पे यूँ लिपटता था
जैसे इंटरनेट पे मिली कोई काल्पनिक गर्लफ्रेंड
असलियत में दीवार के छिपकली से डरके चिपक रही हो।
आज तो बटन भी उसके लग नहीं रहें थे –
पार्टीओं के बुफे में कुछ ज़्यादा ही प्यार समेट लिया ।
जूनियर लोगों को मेल डाला था –
अमीर भिकारियों की भी कोई कमी नहीं है यहाँ।गद्दा भी अब पिचक चूका था –
नजाने कितनी अकेली रातों का बोझ संभाला था उसने।
कुछ दाग तो अब छूटने भी नहीं वाले थे।
आख़िर बहुत रातें चाय पीकर बिताई हैं उस पर।
वही चायवाला कह रहा था – सौ रूपए देगा उसका।
तकिया और बेडशीट का एक डब्बा बाँध भी लिया था।
पर गेट से जैसे ही बहार निकला,
भुट्टे बेचने वाली बुड्ढी अम्मा सोते दिख गयी।
कोने में उसी के बगल में छोड़ आया।फिर बचे थे बिखरे कागजों के वह बंडल –
अब कौनसे तकिए के नीचे रखता उन्हें?
प्रोफेसर लोगों की बात तो कभी नोट नहीं की,
हर क्लास में एक नया सपना ज़रूर दर्ज कर लिया।
वह अनसुने लेक्चरों की विरासत किसको सौंपता?
साथ भी तो नहीं ले जा सकता था-
कहाँ घूमते फिरते कवी बनने का ख़्वाब पाला था
और कहाँ फिर एक कॉलेज में पिसने जा रहा हूँ।
उन नज़्मों के बीज अब नए कॉलेज में नहीं बोने।वरना एक डब्बा वहाँ भी भर जाता –
हर दो साल सपने नहीं दफ़नाने थे, भाई।
चायवाले को ही दे आया जाकर-
भजिये खाते खाते किसी का मन बहल जायेगा।बस यह एक डब्बा बच गया है –
बस यही असली साथी हैं मेरे।
नॉवेल वगेरा तो सारे चाट लिए हैं,
पर यह सिविल इंजीनियरिंग की पोथियाँ पड़ी हैं।
चार सालों में जो क़िताबें खोलीं नहीं थीं
कल उन सबको एक बार तो सूंघ लिया है।
कुछ पर से तो पन्नी तक नहीं हटाई थी,
कल मगर बालकनी के धुप में चंद सफ़हे पढ़ लिए –
नजाने फ़िर कब इनको सांस लेने का मौका मिलेगा।
एक कबर्ड नया लेना पड़ेगा इनको क़ैद करने –
कहाँ डब्बे में सड़ते रहेंगे।ऑटोवाला आगया लगता है।
आस पास सब दोस्त तो पहले ही निकल गए हैं –
टा-टा बाय-बाय का झंझट नहीं होगा।
चलो अब बोरिया बिस्तरा समेट लेता हूँ।
एक आखरी डब्बा यह भी उठा लेता हूँ।
यार, अभी यह डब्बा इतना भारी क्यों लग रहा है?
क्यों लग रहा है कि दिल पे अभी भी एक बोझ है?
खुदके आँचल में बाँध के इन किताबों को,
कहीं मैं उनके सपने भी तो नहीं गाढ़ रहा?
इनका भी तो मन करता होगा कि कई लोग पढ़े इनको –
इन्हें कांच के पीछे अनारकली क्यों बना रहा हूँ?
लगता है साथ इनसे भी छूटने वाला है –
ऑटोवाले को लाइब्रेरी का रास्ता बताना पड़ेगा।