राह चलते किसीसे मिलता हूँ
तो सवाल आता है –
“क्या करते हो?”
सच्चाई बयान करता हूँ तो
पागल समझते हैं मुझे।
कुछ तोड़-मरोड़ कर काट-जोड़ कर
कहानी बना लेता हूँ तो
उनके पिचके हुए फेफड़ों में
कुछ सांस वापिस आ जाती है।
अब तो कोशिश करना छोड़ दिया है।
बोल देता हूँ – “शायर हूँ।”
तसल्ली से फिर वो तरस खाते हैं।
कहते हैं फुसफुसा कर आपस में
“काफ़ी potential था इसमें।
न जाने कौनसे कमज़ोर मौके पे फिसल गया।”
ये टिप्पणी भी बटोर लेता हूँ जेब में –
लम्हों का जमाकार जो हूँ।
इक café के table पे बैठा
आते जाते हर लम्हे को पास बुला लेता हूँ –
“आओ। आज कैसे हो?”
पता नहीं कौनसी जिज्ञांसा
उन्हें भी खींच लाती है मेरी ओर।
अपने राह से छोटा detour लेके
पास बैठ जाते हैं।
कह जातें हैं अपनी कहानियाँ।
मेरी दस्तानों की diary में
एक पन्ना बन जाते हैं।
कोई पूछता है जब –
“कितना बना लेते हो, जनाब?”
बेजिझक कह देता हूँ तभी तभी
कि हर महीने कुछ तीस दिन
जमा हो जाते हैं salary में।
उन तीस दिनों के ब्याज पे
ज़िन्दगी गुज़रती है मेरी।
रोज़ कुछ लम्हें दूसरों में भी बाँट देता हूँ।
आखिर charity भी तो घर से ही शुरू होती है।
Comments
One response to “क्या करते हो?”
[…] Translated from my Hindi poem, क्या करते हो? […]
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