मसीहा

क्या पानी को भी मै बनाने वाला मसीहा था
या प्यासों को पानी पिलाने वाला मसीहा था

कौन जानता है मो’अजिज़ें उसने किये कि नहीं
सभी के ख़िदमत में खो जाने वाला मसीहा था

इस ख़ुदा के बंदे में ख़ुदा पाना मुश्किल नहीं
हर बंदे में ख़ुदा को पाने वाला मसीहा था

काफ़ियों ने कोशिशें की तोड़ने उसका हौसला
टूटे को भी हौसला दिलाने वाला मसीहा था

चढ़ा तो दिया बेगुनाह ही उसे सलीब पर
सबके गुनाह खुद पे चढ़ाने वाला मसीहा था

आंखों से लहु बहाने वाले बहुत थे वहां
हर घाव से आंसू बहाने वाला मसीहा था

हर सदमे पे तूने उसको गालियां दी है मिसरा
हर सदमे को सबक बनाने वाला मसीहा था

बदलाव

है नहीं कि अमीर ही अमीर बनते हैं
छे कदम में प्यादे भी वज़ीर बनते हैं

सही को सही जानना फ़िर भी है आसान
गलत को गलत जानकर ज़मीर बनते हैं

माशूक़ को मुख़ालिफ़ बना देता है शक
भरोसे से मनहूस भी बशीर बनते हैं

पैदाइश भी नहीं परवरिश भी नहीं
बस करम से जुलाहे कबीर बनते हैं

बेख़ौफ़ ही लिखता चल तू मिसरे पे मिसरा
शायरी है सुधरे भी शरीर बनते हैं

क्या दोगे

घर नहीं दे पाए इमारत क्या दोगे
ये कासा भर दो बाकी दौलत क्या दोगे

छोड़ गए इस मासूम को गलती बुला कर
अब इसकी खामोशी की कीमत क्या दोगे

नाम जानता है सारा मोहल्ला तुम्हारा
अब इससे भी ज़्यादा शौहरत क्या दोगे

बंद कर लेते हो कान मुझे गरजता देख
बादल हूँ रोने की इजाज़त क्या दोगे

मोहब्बत तो तुमसे कभी दी ही नहीं गयी
अब देर हो गयी है अब इज़्ज़त क्या दोगे

सकते हो तो दो इसे नाम अपना ‘मिसरा’
पहचान से बड़ी अब विरासत क्या दोगे

न हो सके

अपने कलाम में तुम आबाद न हो सके
तंखादार रह गए आज़ाद न हो सके

बस बोलते रहे कि दुनिया घूमोगे
तुम बरहमपुर के भी सिंदबाद न हो सके

बंदूक भी हो सर पे तुम क्या ही कहोगे
जां बचाने भी शहरेज़ाद न हो सके

याद होंगे तुम्हें अपने अश’आर सारे पर
अफ़सोस है किसी और को याद न हो सके

क्यों करते हो कंजूसियां दादबक्षी में
खुद तो कभी क़ाबिल-ए-दाद न हो सके

अब क्या ही मिला ख़ुदको बुलाकर मिसरा
शायर भी बने और बर्बाद न हो सके

तुम्हारा लगता है

गौर करूं तो इनाम तुम्हारा लगता है
ये राहत-ए-इलहाम तुम्हारा लगता है

बस मैं जानता हूँ मेरे बिखरने का राज़
ज़माने को तो काम तुम्हारा लगता है

है नहीं किसी और को शिकायत मुझसे
लगता है तो इल्ज़ाम तुम्हारा लगता है

भाग जाते हैं शराबज़ादे भी यहां से
गलती से भी गर जाम तुम्हारा लगता है

कब से ही ऐसा होता आ रहा है ना
जुर्म मैं करता हूँ नाम तुम्हारा लगता है

रख लो इस घर को कभी ज़रूरत होगी
तुम्हें जहां तमाम तुम्हारा लगता है

ढूंढ ही लूँगा कोई और हमसफ़र मिसरा
तन्हाई पर अंजाम तुम्हारा लगता है

आम खाया नहीं

साथ में इक पल भी हमने बिताया नहीं
घुटलियां गिनते रहे आम खाया नहीं

तू आयी नहीं खिड़की पे कई दिन से
और इल्ज़ाम है कि मैंने बुलाया नहीं

ये फूल है मेरे इंतिज़ारी की गवाह
ऐसा शेर नहीं जो इसे सुनाया नहीं

ताज़ा है फ़िर भी इतने दिनों से गुलाब
मैं रोता रहा तो ये मुरझाया नहीं

इतनी ही अहमियत थी तेरी ‘मिसरा’
तू गिरता रहा उसने उठाया नहीं

बेटा

बेटा बड़ा हो गया अब आराम होगा
कहां मालूम था यूं सोचना हराम होगा

उसके हर कल पे मेरा हर आज क़ुर्बान था
क्या पता मेरे कल का क्या अंजाम होगा

अपने पास भी बुला कर रख ले अगर तो
बस फासले होंगीं और क़ुर्बत का नाम होगा

महीने गुज़र गए यही सुन के कि
पापा इस महीने भी काफी काम होगा

कंधा देने वो खुद आये कि न आये
उसका एक आंसू भी मेरा इनाम होगा

नाम तक ठुकरा दिए जो सोचे थे मैंने
पोती गुलनाज़ होगी पोता गुलफ़ाम होगा

आगे बढ़ो

क्यों बिख़र गया उसकी सांस निकलते ही
बुझ जाना तो तय है चराग़ के जलते ही

सितारों से पूछ ले उसका नया पता
वो लोग मिलते हैं शहर से दूर चलते ही

आदत डाल ले घड़ी उल्टी पहनने की
उसका दिन जगता है तेरा दिन ढलते ही

पर इस मायूसी में ख़ुदको तबाह मत कर
तेरे दिन बदलेंगे तेरे बदलते ही

भूल जा उस ख़ाब को जो फ़िर दिखेगा नहीं
मिट गया वो ‘मिसरा’ तेरे आंख मलते ही

शायर

रोज़ कागज़ के हाथों फटना पड़ता है
शायर हूँ शायरी से कटना पड़ता है

शायरी वो जंग है जिसमें हर शायर को
आप ही मुक़ाबिल अपने डटना पड़ता है

इतना ज़िद्दी हूँ कि कभी गर अड़ जाऊं
गऊ तक को रास्ते से हटना पड़ता है

इक कौम का गुस्सा बुझाने दूसरे कौम पे
क्यों इक नए हादसे को घटना पड़ता है

हिंदी उर्दू तो दोनों के ज़ुबां पे हैं
इन्हें क्यों मजहबों में बटना पड़ता है

कायरों ने ऐसी आग लगाई है ‘मिसरा’
शायरों को ये धुंआ छटना पड़ता है

जमती नहीं

ज़माने से दूर हुआ कि किसी से जमती नहीं
तन्हाई में जाना कि मेरी मुझ ही से जमती नहीं

अपने को आप ही में एक जज़ीरा बना दिया मगर
अब इन लहरों की नटखट दिल्लगी से जमती नहीं

आदत थी किताबों की गहराईयों में डूबने की
अब उनसे बनी टीले की ऊंचाई से जमती नहीं

अच्छा हुआ पुराने कागज़ ग़ुम हो गए ‘मिसरा’
हिंदी पे दिल आ गया है अंग्रेज़ी से जमती नहीं