मेरे खयाल-ए-ख़ुदकुशी

कदम कदम पे साया सा
क्यों आता मेरी ओर है यूँ
गले गले के दरमियां
क्यों बांधा कोई डोर है यूँ

तू रहता क्यों फ़िराक़ में कि
ज़मीं ही मेरी खींचेगा
ज़्यादा ग़म हो सीने में तो
ज़मीं लहु से सींचेगा

ले मान लिया तेरी बात को
कि पूरा ही बेकार हूँ मैं
पर इस वहम में न रहियो
कि तेरा ही शिकार हूँ मैं

तू चल ले चालें जितनीं भी
दे मात मुझे न पाएगा
शह शह के चक्कर में
खुद व्यूह में फस जाएगा

बहुत हुआ नादानी ये
कब तक इसे हम झेलेंगे
कब तक हम एक दूजे के संग
लुक्का छुप्पी खेलेंगे

वुजूद तेरा मुझ बिन नहीं
समझ इतना तो पाया हूँ
उतारने तेरे मौत की लत मैं
परोस के जीना लाया हूँ

साथ में मरना तय ही है जब
थोड़ा साथ में जी भी ले
आंसू तूने खूब पिलाये
अब रूह अफज़ा भी पी ही ले