मोहब्बत की तरह

सज़ा दी जिस दिल ने अदालत की तरह
माफ़ी दी उसी ने इबादत की तरह

खोल के मोहब्बत के सारे दरवाज़े वो
टिक गई ज़हन में इमारत की तरह

रूहानी ज़रूरत बन गई है वो अब
ज़िद्दी सी जिस्मानी ज़रूरत की तरह

मेरे बिखरे टुकड़ों को जोड़ रही है वो
किंत्सुगी सी किसी मरम्मत की तरह

काफ़ी मसरूफ़ रहने लगी है आजकल वो
मोहलत देती है मुहुर्रत की तरह

उस अफ़सोस को भी बहा आया मैं ‘मिसरा’
संभाला था जिसको अमानत की तरह