आम रखना

आज खिड़की पे कुछ कटे हुए आम रखना
एक बुलबुल भेजा है मेरा पैग़ाम रखना

तुम मसरूफ़ रहो अपने में हर सवेरे
पर मेरे हिस्से में अपना हर शाम रखना

मेरी हर सांस गुज़रेगी तेरी ज़ुल्फ़ों से
अपनी चोटी में ज़रा सा आराम रखना

मैं जल्द आऊंगा तुमसे रूबरू होने
जिसकी बात हुई तय्यार वो इनाम रखना

शरम हया तो मैंने कब की छोड़ दी है
रख सको तो तुम अपने गाल गुल्फ़ाम रखना

ज़माने से छुपाने लब पर जो रखो
इरादों में मगर ‘मिसरा’ ही नाम रखना