दफ़्तरवाले

अपने ही दफ़्तर में अजनबी हूँ
सबकी रुकावट-ए-तरक्की हूँ

मैं आते ही सब चुप हो जाते हैं
जैसे बोलने पे एक बंदगी हूँ

जब काम से जाता हूँ उनके पास मैं
उन्हें लगता है मैं मतलबी हूँ

मुझे बर्दाश्त ऐसे करते हैं कि
वो कमल हैं और मैं गंदगी हूँ

उन्हें अलग मज़हब बनाना है
तो हाँ ‘मिसरा’ मैं भी मज़हबी हूँ