आओ

कोई तो सुन लो इन दीवारों के सिवा
कुछ ग़ज़ल भी हैं मेरे शिक़वों के सिवा

कभी आओ देखो मेरा कमरा यहां
सब बराबर रखता हूँ वादों के सिवा

मेरी किताबों से मिल कर खुश हैं ग़ुलाब
कि घर है इनका तेरे बाग़ों के सिवा

कुछ नहीं जिसपे भरोसा न कर सको
मेरी इन मीठी मीठी बातों के सिवा

सब हारोगे मेरे सामने कुछ न होगा
दाव पे लगाने जज़्बातों के सिवा

मुझे गर जानना है तो साथ चलो ‘मिसरा’
जहां कोई न हो हम दोनों के सिवा