बीच में आ गयी

बनना मुझे शायर था आशिक़ी बीच में आ गयी
फ़ना इश्क़ में होना था ज़िन्दगी बीच में आ गयी

शिकस्तगी सी मेरी ये ज़िन्दगानी थी मगर
पल भर जीत के जीने की तिश्नगी बीच में आ गयी

घाट घाट ढूंढा मगर इक बूंद फ़तह की मिली नहीं
तलाश जारी रखता पर मुफ़लिसी बीच में आ गयी

रात का दिन और दिन की रात करके पैसे जोड़ लिए कुछ
जम चुका था नौकरी में मायूसी बीच में आ गयी

हर सुबह हर शाम बस ख़ुदकुशी के खयाल आये
मौत लेने चला ही था अजनबी बीच में आ गयी

जीना फिर सिखाया उसने जीना साथ में चाहती थी
मैं नहीं तय्यार था और खुदगर्ज़ी बीच में आ गयी

दिल के रेज़े बटोर कर वो चल दी अपने ही रास्ते
सोचा नाम पुकारूं पर खामोशी बीच में आ गयी

खामोश भी मैं तन्हा भी न जाने क्या क्या कर जाता
शुकर मनाओ ‘मिसरा’ शाइरी बीच में आ गयी