मैं न रहूँ

नौ से पांच ये है नहीं
पर उससे बेहतर भी नहीं
सर झुका के मैं सर बेचूं
ऐसी फ़ितरत ही नहीं

काम है ये मक़सद नही
कब तक इसे कर पाऊंगा
सिक्का सिक्का जोड़ के भी
फुक्कड ही रह जाऊंगा

वक़्त भी मुझ पर रुके
ऐसा खुद टीक जाना है
मैं न रहूँ तो भी रहूँ
ऐसा कुछ लिख जाना है

अंदर जो फ़नकार उससे
मिला नज़र कब पाऊंगा
तोहफ़ा ये ख़ुदा का मुझपे
तौहीं थोड़ी कर पाऊंगा

आवाज़ को अवाम के
रूह से जा मिलाना है
ज़हनों में वो जम जाये
ऐसा वज़न दिलाना है

वक़्त को फुरसत न हो
यूँ उसे बेहलाऊँगा
मैं न रहूँ तो भी रहूँ
ऐसा कुछ लिख जाऊंगा