गद्दारी समझ कर

शायरी को कॉम से गद्दारी समझ कर
किताबें जला गए बिमारी समझ कर

घोल उसी राख को सियाही में शायर
लिखते ही रहे ज़िम्मेदारी समझ कर

मत’अलों पे मस’अलों की मशालें जलाए
जनाज़ों पे घूम रहें हैं सवारी समझ कर

फुज़ूल गोलियां न खर्चो इनपे ये तो
क़ुर्बानी दे रहे हैं फ़नकारी समझ कर

नाचोगे खुद उनके हर धुन पे तुम जो
मग़रूर हो खुदको मदारी समझ कर

तुम्हारे ताज के नाम भी एक मिसरा पेश है
सुन लो तबाही की तय्यारी समझ कर